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भागवत गीता जीने की कला सिखाती है

भागवत गीता जीने की कला सिखाती है

हाभारत ग्रन्थ में गीता सर्वोच्च स्थान पर विराजती है. उसका दूसरा अध्याय भौतिक युद्ध का व्यवहार सिखाने के बदले स्थितप्रज्ञ के लक्षण सिखाता है. स्थितप्रज्ञ का सांसारिक के साथ कोई सम्बंध नहीं हो सकता. यह बात मुझे तो उसके लक्षणों में ही निहित दिखाई दी है. परिवार के मामूली झगड़े के ओचित्य या अनोचित्त्य का निर्णय करने के लिए गीता जैसी पुस्तक नहीं रची जा सकती.

क्या आप बुद्धिमान है

अवतार का अर्थ है शरीरधारी विशिष्ट पुरुष. जीवमात्र ईश्वर के अवतार है, परन्तु लौकिक भाषा में सबको अवतार नही कहते. जो पुरुष अपने युग में सबसे श्रेष्ठ धर्मवान पुरुष होता है. उसे भविष्य की प्रजा अवतार के रूप में पूजती है. इसमें मुझे कोई दौष नहीं मालूम होता. अवतार में यह विश्वास मनुष्य की अंतिम उदात्त आध्यात्मिक अभिलाषा का सूचक है. ईश्वर रूप हुए बिना मनुष्य को सुख नही मिलता, शांति का अनुभव नहीं होता.

ईश्वर रूप बनने के लिए किये जाने वाले प्रयत्न का ही नाम सच्चा और एकमात्र पुरुषार्थ है और वही आत्म दर्शन है. यह आत्म दर्शन जिस प्रकार समस्त धर्म ग्रंथो का विषय है, उसी प्रकार गीता का भी है. लेकिन गीतकार ने इस विषय का प्रतिपादन करने के लिए गीता की रचना नहीं की है. गीता का उद्देश्य आत्मार्थी करने का एक अद्वितीय उपाय बताना है.

वह अद्वितीय उपाय है कर्म के फल का त्याग. इसी केंद्र बिंदु के आसपास गीता का  सारा विषय गूंधा गया है. जहाँ देह है वहाँ कर्म तो है ही. कर्म से कोई मनुष्य मुक्त नहीं है.

परन्तु प्रत्येक कर्म के कुछ न कुछ दौष तो होता ही है. और मुक्ति केवल निर्दोष मनुष्य को ही मिलती है. तब कर्म के बंधन से अर्थात दौष के स्पर्श से कैसे छुटा जा सकता है? इस प्रशन का उत्तर गीता जी ने निश्चयात्मक शब्दों में दिया है. निष्काम कर्म करके, यज्ञार्थ कर्म करके, कर्म के फल का त्याग करके, सारे कर्म कृष्णापर्ण करके अर्थात मन, वचन और काया को ईश्वर में होम कर.

परन्तु निष्कामता कर्म के फल का त्याग, केवल कह देने से ही सिद्ध नहीं हो जाता. वह केवल बुद्धि नहीं हो जाता. वह केवल बुद्धि का प्रयोग नहीं है. वह ह्रदय मंथन से ही उत्पन्न होता है. इस तरह हम देखते है. कि ज्ञान प्राप्त करना, भक्त होना ही आत्म दर्शन है, आत्म दर्शन इससे भिन्न कोई वस्तु नही है. ऐसे ज्ञानियो और ऐसे भक्तो को गीता ने स्पष्ट शब्दों के कह दिया है. कर्म के बिना किसी को सिद्धि प्राप्त नहीं हुई.

फलत्याग का अर्थ कर्म के परिणाम के विषय में लापरवाह रहना नहीं है. परिणाम का और साधना का विचार करना तथा दौनो का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है. इतना करने के बाद जो मनुष्य परिणाम की इच्छा किये बिना साधन में तन्मय रहता है. वह फल त्यागी कहा जाता है.

फलासक्ति के ऐसे कडवे परिणामो से गीतकार ने अनासक्ति का अर्थात कर्मफल के त्याग का सिधांत निकाला है और उसे दुनिया के सामने अत्यंत आकर्षक भाषा में रखा है. सामान्य: यह माना जाता है कि धर्म परस्पर विरोधी है. व्यापार आदि सांसारिक व्यवहारों में धर्म का पालन नही हो सकता, धर्म के लिए स्थान नहीं हो सकता.

धर्म का उपयोग केवल मोक्ष के लिए ही किया जा सकता है. धर्म के स्थान पर धर्म शोभा देता है अर्थ के स्थान पर अर्थ शौभा देता है. मैं मानता हूँ कि गीतकार ने इस भ्रम को दूर कर दिया है. उन्होंने मोक्ष और सांसारिक व्यवहार के  बीच ऐसा कोई भेद नहीं रखा है, परन्तु धर्म को व्यवहार में उतारा है. जो धर्म व्यवहार में नहीं उतारा जा सकता वह धर्म ही नही है. यह बात गीता में कही गई है, ऐसा मुझे लगा है. अत: गीता के मत के अनुसार जो कर्म आसक्ति के बिना हो ही न सके वे सब त्याज्य है. छौड़ देने लायक है. यह सुवर्ण नियम मनुष्य को अनेक धर्म संकटों से बचाता है. इस मत के अनुसार हत्या, झूठ व्यभिचार आदि कर्म स्वभाव से ही त्याज्य हो जाते है. इससे मनुष्य जीवन सरल बन सकता है. और सरलता से शांति का जन्म होता है.

इस विचारसरणी का अनुसरण करते हुए मुझे ऐसा लगा है कि गीताजी की शिक्षा का आचरण करने वाले मनुष्य को स्वाभाव से ही सत्य और अहिंसा का पालन करना पड़ता है. फलासक्ति के आभाव में न तो मनुष्य को झूठ बोलने का लालच होता है. और न हिंसा करने का लालच होता है. हिंसा या असत्य के किसी भी कार्य का हम विचार करे, तो पता चलेगा कि उसके पीछे परिणाम की इच्छा रहती ही है.

गीता कोई सूत्र ग्रन्थ नहीं है. गीता एक महान ग्रन्थ है. हम उसमे जितने गहरे उतरेंगे उतने ही उसमे से नए और सुन्दर अर्थ हमें मिलेंगे. गीता जनसमाज के लिए है. इसलिए उसमे एक ही बात को अनेक प्रकार से कहा गया है. गीता में आये हुए महान शब्दों के अर्थ प्रत्येक युग में बदलेंगे और व्यापक बनेगे. परन्तु गीता का मूल मन्त्र कभी नहीं बदलेगा. यह मन्त्र जिस रीति से जीवन में साधा जा सके उसे रीती को दृष्टी में रखकर जिज्ञासु गीता के महाशब्दो का मनचाहा अर्थ कर सकता है.

गीता विधि निषेध करने योग्य और न करने योग्य कर्म बताने वाला संग्रह ग्रन्थ भी नहीं है. एक मनुष्य के लिए जो कर्म विहित हो, वह दुसरे के लिए निषिद्ध न करने योग्य हो सकता है. एक काल या एक देश में जो कर्म विहित हो, वह दूसरे काल या दूसरे देश में निषिद्ध हो सकता है. अत: निषिद्ध केवल कलाशक्ति और विहित अनासक्ति है.

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